सरकारी नौकरी नहीं मिली तो 'MA English चायवाली' नाम से दुकान खोली, अब रोज 3 हजार का बिजनेस

सरकारी नौकरी नहीं मिली तो 'MA English चायवाली' नाम से दुकान खोली, अब रोज 3 हजार का बिजनेस

पश्चिम बंगाल के नॉर्थ 24 परगना की रहने वाली तुकटुकी दास पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी करना चाहती थीं। उनके परिवार की भी यही ख्वाहिश थी कि बेटी को कहीं सिक्योर जॉब मिल जाए। तुकटुकी ने कोशिश पूरी की, कई एग्जाम्स दिए, लेकिन नौकरी हाथ नहीं लगी। इसके बाद तुकटुकी ने कुछ अलग और खुद का करने का इरादा किया और हावड़ा स्टेशन पर चाय की एक दुकान खोल ली। नाम रखा MA English चायवाली। देखते ही देखते उनका नाम और काम दोनों लोगों की जुबान पर चढ़ गया। उनकी दुकान पर चाय की चुस्की लेने वालों की भीड़ लगनी शुरू हो गई। महीने भर से भी कम वक्त में उन्होंने अच्छा खासा सेटअप जमा लिया। आज वो हर दिन करीब 3 हजार रुपए की चाय बेच रही हैं।

मां-पिता चाहते थे कि मैं गवर्नमेंट सर्विस करूं

26 साल की तुकटुकी एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पिता किराने की दुकान चलाते हैं। उनकी मां भी पिता की मदद करती हैं। तुकटुकी ने ग्रेजुएशन के दौरान ही गवर्नमेंट सर्विस की तैयारी शुरू कर दी। उनकी मां चाहती थी कि बेटी टीचर बने, जबकि पिता चाहते थे कि कोई भी जॉब हो चलेगा, लेकिन सरकारी ही चाहिए।

तुकटुकी कहती हैं कि कोई भी जॉब क्यों? अपनी पसंद की नौकरी क्यों नहीं? क्या सरकारी नौकरी ही लास्ट ऑप्शन है? ये सारे सवाल मेरे दिमाग में आते रहते थे, लेकिन फैमिली प्रेशर और घर की जरूरतों को देखते हुए मैंने भी तय किया कि जब इनकी पसंद गवर्नमेंट सर्विस है, तो कोशिश करके देखती हूं।

भास्कर से बात करते हुए तुकटुकी कहती हैं कि ग्रेजुएशन के दौरान और फिर मास्टरर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी मैं कोशिश करती रही। कई एग्जाम्स दिए, लेकिन कहीं न कहीं किसी वजह से सिलेक्शन नहीं हो पाता था। फिर मुझे लगा कि अब बहुत हो गया, कुछ और प्लान करना चाहिए।

स्टार्टअप स्टोरीज पढ़ने से मिली कुछ करने की प्रेरणा

वे कहती हैं कि पिछले कुछ सालों से मैं यंग एंटरप्रेन्योर की स्टोरीज पढ़ रही हूं। कई यूथ अच्छी खासी जॉब छोड़कर अपना स्टार्टअप चला रहे हैं और अच्छा परफॉर्म भी कर रहे हैं। इससे मैं काफी इंस्पायर हुई। मेरे दिमाग में ख्याल आया कि जब दूसरे लोग करते हैं तो मैं क्यों नहीं। मैं भी कर सकती हूं।

इसके बाद टुकटुकी ने भी खुद के स्टार्टअप को लेकर प्लान करना शुरू किया। हालांकि, तब वे तय नहीं कर पा रही थी कि क्या काम किया जाए और उसका मॉडल क्या होगा। तुकटुकी कहती हैं कि कई स्टार्टअप की स्टोरीज पढ़ने और सेल्फ रिसर्च के बाद मुझे लगा कि चाय का बिजनेस शुरू किया जा सकता है। यह थोड़ा आसान है और कम बजट में किया भी जा सकता है।

जब चाय वाला हो सकता है तो चाय वाली क्यों नहीं

तुकटुकी कहती हैं कि मैंने कई चाय वाले स्टार्टअप की स्टोरी पढ़ी। मुझे उनका काम अच्छा लगा। फिर इसको लेकर जब अपने फ्रेंड्स और फैमिली से चर्चा की तो उनका रिस्पॉन्स अच्छा नहीं था। उनका कहना था कि लड़की को चाय की दुकान मैनेज करने में काफी दिक्कत होगी। लोग क्या सोचेंगे, अब यही काम बच गया है क्या? पापा तो एकदम नहीं चाहते थे कि मैं चाय बेचूं, यहां तक कि अभी भी वे बहुत खुश नहीं हैं, लेकिन मैंने तय किया मैं यह काम करुंगी। जब चाय वाला हो सकता है तो चाय वाली क्यों नहीं। मुझे इस माइंडसेट को भी चेंज करना था।

इसके बाद तुकटुकी ने चाय को लेकर रिसर्च करना शुरू किया। किस तरह की चाय होगी, क्या फ्लेवर होगा? कहां से रॉ मटेरियल मिलेगा? लोकेशन क्या होगा? ये कुछ ऐसे सवाल थे, जिसको लेकर तुकटुकी रिसर्च करती रहीं।

कैसे प्लानिंग की, कैसे शुरू किया काम?

तुकटुकी कहती हैं कि ज्यादातर लोग चाय पीते हैं। यानी इसकी डिमांड तो है, लेकिन लगभग सभी घरों में चाय बनती भी है और मार्केट में भी चाय की दुकान की कमी नहीं है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल मेरे मन में था कि कोई मेरी दुकान पर क्यों आएगा और कैसे आएगा? यानी लोकेशन सबसे महत्वपूर्ण था। इसको लेकर मैंने काफी रिसर्च की। कई लोकेशन को लेकर पड़ताल की। मार्केटिंग सेक्टर से जुड़े अपने एक दोस्त की मदद ली। इसमें करीब 3 महीने लग गए। इसके बाद इसी साल नवंबर में मैंने हावड़ा स्टेशन एक प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर अपनी दुकान खोली। दुकान का सेटअप करने में करीब 10 लाख रुपए की लागत आई।

दुकान के नाम को लेकर टुकटुकी कहती हैं कि मैंने MBA चायवाला सुना था, इंजीनियर चायवाला सुना था, लेकिन कोई चायवाली के बारे में नहीं सुना था। इसलिए ये तो तय कर लिया था कि जो भी नाम होगा, उसमें चायवाली वर्ड जरूर होगा। काफी सोच समझ और रिसर्च के बाद हमने MA English चायवाली नाम रखा। खुशी की बात है कि ये नाम लोग पसंद कर रहे हैं।

9 अलग- अलग फ्लेवर की चाय, खुद ही मैनेज करती हैं सारा काम

तुकटुकी बताती हैं कि फिलहाल वे 9 अलग-अलग फ्लेवर की चाय बना रही हैं। इनमें अदरक, इलायची, केसर जैसे फ्लेवर हैं। जिसकी कीमत 5 रुपए से लेकर 35 रुपए तक है। कीमत कप की साइज और फ्लेवर के मुताबिक है।

वे कहती हैं कि अभी हमारा चाय बनाने को लेकर कोई खास फार्मूला नहीं है, क्योंकि अभी एक महीना भी नहीं हुआ। अभी मैं लगातार रिसर्च और एक्सपेरिमेंट कर रही हूं। कई डिस्ट्रीब्यूटर भी मेरे सम्पर्क में हैं। जल्द ही हम कुछ न कुछ अपना फॉर्मूला बनाएंगे। अभी गूगल से देखकर कुछ न कुछ रोज बेहतर करने की कोशिश कर रही हूं।

तुकटुकी रोज सुबह 5 बजे जाग जाती हैं और अपने काम की तैयारी में जुट जाती हैं। वे सुबह में 6 बजे से 11 बजे तक और शाम में 5 बजे से 9 बजे रात तक दुकान पर रहती हैं। इसके बाद वे घर जाती हैं और फिर सुबह की तैयारी में लग जाती हैं। यानी सुबह 4 बजे से रात 12 बजे तक वे अपने काम में रहती हैं। अभी सारा काम तुकटुकी खुद ही हैंडल कर रही हैं। शाम में चाय के साथ वे समोसा भी सेल करती हैं।

वे बताती हैं कि अभी कस्टमर्स अच्छी संख्या में आ रहे हैं। शाम के वक्त तो काफी ज्यादा भीड़ हो जाती है। उन्हें मैनेज करना भी चैलेंजिंग टास्क होता है। कई लोग अब मेरा सपोर्ट कर रहे हैं। कई यूथ मेरे साथ सेल्फी भी खिंचाते हैं। हालांकि लड़की होने के नाते कई लोग मेरे काम को अभी भी खास तवज्जो नहीं देते हैं। उन्हें लगता है कि लड़की होकर ये काम नहीं करना चाहिए, लेकिन सच कहूं तो अब मैं पीछे स्टैंड लेने वाली नहीं हूं। अब धीरे-धीरे इस काम को और बढ़ाऊंगी।

अगर चाय के स्टार्टअप में आपकी दिलचस्पी है तो ये स्टोरी आपके काम की है

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के रहने वाले रेवन शिंदे 12वीं तक पढ़े हैं। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। एक साल पहले तक वे सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते थे। आज वे चाय की होम डिलीवरी का बिजनेस करते हैं। हर दिन एक हजार से ज्यादा उनके पास ऑर्डर आते हैं। इससे हर महीने 2 लाख रुपए से ज्यादा उनकी कमाई हो रही है।


जानिए आखिर क्यों लाल, हरा और पीला ही होता है ट्रैफिक लाइट का रंग

जानिए आखिर क्यों लाल, हरा और पीला ही होता है ट्रैफिक लाइट का रंग
आजकल इंसान की स्पीड ट्रैफिक लाइट पर निर्भर करती है। दुनिया की पहली ट्रैफिक लाइट 10 दिसंबर, 1868 को लंदन, इंग्लैंड में संसद भवन के बाहर सड़क पर लगाई गई थी। वहीं आप नहीं जानते होंगे कि रेलवे के इंजीनियर जेके नाइट ने पहली ट्रैफिक लाइट लगाई थी। रात में इसे दिखाई देने के लिए गैस का उपयोग किया जाता था। उस समय ट्रैफिक लाइट में केवल दो रंगों का इस्तेमाल होता था जो एक लाल था और दूसरा हरा, उसके काफी समय बाद ट्रैफिक लाइट्स में पीला रंग लाया गया था।
ट्रैफिक लाइट में लाल रंग डालने का कारण लोगों को सतर्क करना था। आप जानते ही होंगे कि शुरू से ही रेड कलर का मतलब रहा है 'आगे खतरा है।' इसी बात को इंगित करने के लिए लाल रंग चुना गया था। वैसे भी हम सभी इस बात से भी वाकिफ हैं कि अन्य रंगों की तुलना में लाल रंग गहरा रंग है इसके अलावा इसे दूर से भी साफ़ देखा जा सकता है। इसी वजह से इस रंग का इस्तेमाल कार या यात्री को ट्रैफिक लाइट पर रोकने के लिए करना शुरू कर दिया गया था।

पीला रंग शुरू से ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इस रंग को ट्रैफिक लाइट में रखने का कारण था कि जब पीली रोशनी हो तो यह संकेत मिले कि आप फुटपाथ को पार करने या वाहन को आगे बढ़ाने या अपनी ऊर्जा का उपयोग करने के लिए तैयार हैं।

हरे रंग को प्रकृति से जोड़कर देखते हैं। ऐसे में कहा जाता है यह रंग इस बात की तरफ इशारा करता है कि सब कुछ ठीक है। इस वजह से इसे ट्रैफिक लाइट में लाया गया ताकि यह पता चल सके कि अब वाहन को आगे बढ़ने के लिए या पैदल चलने वालों को सड़क पार करने के लिए चलना चाहिए।