क्या विकास दुबे के तार जुड़े थे पॉलिटिक्स से?, जाने जवाब

क्या विकास दुबे के तार जुड़े थे पॉलिटिक्स से?, जाने जवाब

कुख्यात Gangster Vikas Dubey द्वारा Uttar Pradesh के Kanpur में पुलिसवालों के हत्याकांड (Police Party Killing) को अंजाम देने के बाद बड़ा सवाल ये खड़ा हो रहा है

कि Politics-Crime Nexus कितनी बड़ी समस्या है? चूंकि विकास दुबे के तार पॉलिटिक्स से जुड़े होना साबित हो चुका है इसलिए यह विमर्श व भी ज़रूरी हो जाता है कि देश में क्या सियासत व जुर्म (Crime in Politics) एक ही सिक्के के दो पहलू हो चुके हैं? यह स्थिति कितनी गंभीर है व इससे कैसे निपटा जा सकता है?

आंकड़े परेशान करने वाले हैं क्योंकि पॉलिटिक्स में अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पॉलिटिक्स के लिए 'स्वच्छता अभियान' चलाए जाने की कोशिशें न्यायपालिका करती रही है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ये कोशिशें बहुत ज्यादा व मज़बूत साबित नहीं हो सकी हैं। कुछ बिंदुओं में ये रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर स्पष्ट रूप से देखें व जानें कि कैसे 'गुंडाराज' के चंगुल में फंसी पॉलिटिक्स को 'आत्मनिर्भर' होने की ज़रूरत है।

बहुत भयानक है सियासत व जुर्म की सांठ-गांठ
पिछले कुछ दशकों में इस गठबंधन को लेकर कुछ चर्चाएं प्रारम्भ हुई हैं व लोगों का ध्यान इस पर गया है। क्राइम व पॉलिटिक्स की गिरोहबंदी का भंडाफोड़ करने व कैसे राजनीतिज्ञों व ब्यूरोक्रेट्स की मदद से क्राइम का साम्राज्य फैलता है व कैसे ये लोकतंत्र व कानून को ठेंगा दिखाता है, इस बारे में 1993 में बनी एनएन वोहरा समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की थी।


इस रिपोर्ट को इतना 'विस्फोटक' बताया गया कि यह कभी संसद में चर्चा के लिए रखी ही नहीं गई। ओआरएफ के एक कि गृह मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को कहीं दबा दिया। हालिया वर्षों में भी कुछ रिपोर्ट्स व दस्तावेज़ इस विषय पर काबिले-गौर रहे हैं।

क्यों होता चला गया पॉलिटिक्स का अपराधीकरण?
देश में क्राइम के साये में होने वाले 'स्वतंत्र व पारदर्शी चुनावों' के विरोधाभास, पार्टियों का अपराधियों को टिकट देना व जनता का किसी प्रत्याशी के आपराधिक बैकग्राउंड को नज़रअंदाज़ करने जैसे मुद्दों पर मिलन वैष्णव की रिसर्च ‘When Crime Pays: Money and Muscle in Indian Politics’ बहुत से राज़ खोलती है।

अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए कार्य करने वाली वॉशिंग्टन बेस्ड एक संस्था के सीनियर फैलो रहे वैष्णव के मुताबिक 1980 व 90 के दशक में कांग्रेस पार्टी के कमज़ोर होने, हाशिये की पार्टियों के मुख्यधारा में आने व कानून व्यवस्था के कमज़ोर हो जाने से पॉलिटिक्स में अपराधीकरण होता गया।



क्या बता रहे हैं आंकड़े?
लोकसभा चुनाव 2014 में 21% ऐसे प्रत्याशी जीते, जिनके विरूद्ध घोषित गंभीर आपराधिक मामल चल रहे थे। 2009 में ऐसे 17% प्रत्याशी जीते थे व 2004 में 12%। दूसरी तरफ, वर्ष 2018 में केन्द्र ने उच्चतम न्यायालय में जो एफिडेविट दिया, उसके मुताबिक बिहार के चुने हुए जनप्रतिनि​धियों के विरूद्ध सबसे ज़्यादा 249 केस पेंडिंग थे, जबकि केरल व पश्चिम बंगाल में क्रमश: 233 व 246. जनप्रतिनिधियों के विरूद्ध सबसे ज़्यादा आपराधिक मामलों वाले राज्यों में दिल्ली, पश्चिम बंगाल व कर्नाटक का नाम भी शुमार रहा।


'साफ राजनीति' के लिए आंदोलन करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR के मुताबिक वर्ष 2014 में राज्यों व केन्द्र में कुल मिलाकर 1581 ऐसे विधि निर्माता थे, जिनके विरूद्ध इस तरह के अपराधी केस थे, जिनमें कम से कम 5 वर्ष की सज़ा हो सकती थी।

भाजपा में सबसे ज़्यादा अपराधी? किस पार्टी में कितने?
2014 के आम चुनावों के नतीजों के विश्लेषण को लेकर , उनके मुताबिक बीजेपी के 281 विजेता प्रत्याशियों में से 98 यानी 35 प्रतिशत विजेताओं के विरूद्ध घोषित​ अपराधी केस थे। इनमें से 63 के विरूद्ध हत्या, मर्डर का प्रयास, सांप्रदायिक दंगे भड़काना, किडनैपिंग व स्त्रियों के विरूद्ध क्राइम जैसे गंभीर आपराधिक मामलों का होना पाया गया था।
 

कांग्रेस के अपराधी व गंभीर अपराधी केस वाले प्रत्याशियों का आंकड़ा 18% व 7% था। इसी तरह, ये भी बताया गया कि जिन दस सांसदों के विरूद्ध मर्डर के मुद्दे चल रहे थे, उनमें से 4 बीजेपी के थे व एक एक सांसद कांग्रेस, एनसीपी, एलजेपी, राजेडी, स्वाभिमानी पक्ष व निर्दलीय था।



मौजूदा लोकसभा में क्राइम का ग्राफ
वर्ष 2019 के आम चुनाव के बाद लोकसभा में जो 539 सांसद पहुंचे थे, उनमें से 233 के विरूद्ध घोषित अपराधी केसों का होना पाया गया। कि इस लोकसभा में करीब आधे सांसदों के विरूद्ध आपराधिक मुकदमे चल रहे थे। बहरहाल, 2009 में सांसदों के विरूद्ध आपराधिक मामलों की तुलना में 2019 की लोकसभा में ऐसे सांसद 44 प्रतिशत ज़्यादा हो चुके ​हैं।

कैसे हुईं पॉलिटिक्स की सफाई की कोशिशें?
उच्चतम न्यायालय व चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं समय समय पर कदम उठाती रही हैं। मसलन, 2002 में उच्चतम न्यायालय ने सभी चुनावी प्रत्याशियों को अपना आपराधिक ब्योरा देने के आदेश दिए थे। वहीं, चुनाव आयोग को भी आदेश दिए गए थे कि चुनाव क्षेत्र में जनता के सामने प्रत्याशियों का आपराधिक ब्योरा मिलना चाहिए। 2017 में उच्चतम न्यायालय ने चुने गए जनप्रतिनिधियों के विरूद्ध चल रहे आपराधिक मामलों के एक वर्ष के भीतर निपटारे के लिए केन्द्र सरकार को फास्ट ट्रैक न्यायालय बनाए जाने की हिदायत भी दी थी।

कैसे नाकाफी रही हैं अब तक की कोशिशें?
उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन पूरी तरह नहीं किया जाता रहा। मसलन, फास्ट ट्रैक 10 स्पेशल न्यायालय बनाए गए थे, जिनमें 1233 केस ट्रांसफर किए गए थे। लेकिन, यहां भी केस एक वर्ष के भीतर नहीं सुलझे व चुने हुए जनप्रतिनिधियों के दोषी पाए जाने की दर सिर्फ 6% रही। तो पहली बात, पॉलिटिक्स से क्राइम की सफाई के मुद्दे में सरकारों का रवैया बेहद ढीला रहा है।

दूसरी बात है कि सियासत में जुर्म की पैठ को समाप्त करने के लिए सिर्फ न्यायालय के स्तर का दखल बहुत ज्यादा नहीं है। वैष्णव मानते हैं कि अदालतों की सीमा है, जिसके आगे वो जा नहीं सकतीं। तीसरी बात है, कि हमारा चुनाव आयोग बाहर से जो भी दिखे, अस्ल में बहुत ज्यादा लाचार संस्था है। रिपोर्ट्स की मानें तो इसके पास सियासी पार्टियों को मान्यता देने का अधिकार है, लेकिन खत्म करने का नहीं।


सियासी पार्टियों से सालाना हिसाब किताब लेने का अधिकार आयोग को है, लेकिन इलेक्टोरल बॉंड्स की व्यवस्था से अब पार्टियां सारा पैसा बताने के लिए बाध्य नहीं हैं। व रही बात जनता की तो हिंदुस्तान में वोटिंग छवि से ज़्यादा प्रभावित है, असली रिकॉर्ड्स से कम। सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज़ (CSDS) के संजय कुमार की मानें तो :
 

लोग जिस रूप में प्रत्याशी को पहचानते हैं, उसी के आधार पर वोट करते हैं। अगर किसी प्रत्याशी ने वोटरों के भले के लिए कुछ कार्य किया है, तो वोटर उसे अहमियत देते हैं, भले ही उसका आपराधिक रिकॉर्ड कुछ भी हो।



तो क्या नहीं बदल सकती तस्वीर?
इस बारे में विशेषज्ञ भी एकमत नहीं हैं। सब ये तो मानते हैं कि ये एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन किस रास्ते से? इस पर कोई एकराय नहीं है। वैष्णव इसे भारतीय सरकारों की नाकामी मानते हैं ​जो देश को मूलभूत सेवा नहीं दे सकीं व देश में नेताओं के नाम पर 'बाहुबली' राज स्थापित होता गया। CSDS के कुमार मानते हैं कि सुधार व परिवर्तन की शुरूआत जनता की मांग व सियासी पार्टियों की इच्छाशक्ति से ही संभव है।




वहीं, एक रिपोर्ट के मुताबिक ADR के प्रोफेसर जगदीप छोकर कहते हैं कि सिर्फ एक कानून बनाने की देर है। 'सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में क्या 543 बेदाग नेता नहीं मिल सकते?' छोकर के मुताबिक क्रिमिनल चुने जाते हैं क्योंकि जनता के पास ठीक विकल्प नहीं होते। इन दशा का हल एक कठोर कानून में है, जिसके लिए सिर्फ इच्छाशक्ति चाहिए जो हिंदुस्तान की पॉलिटिक्स में 'स्वच्छ हिंदुस्तान अभियान' चला सके।