कॉमनवेल्थ विमेंस हॉकी में पहला गोल करनेवालीं सलीमा की कहानी

कॉमनवेल्थ विमेंस हॉकी में पहला गोल करनेवालीं सलीमा की कहानी

कॉमनवेल्थ गेम्स में जिस भारतीय स्त्री हॉकी टीम ने ब्रांज मेडल जीतकर 16 वर्ष का सूखा समाप्त किया, उस टीम में सलीमा टेटे जैसी खिलाड़ी हैं जिसने अपने असाधारण खेल से महज 6 सालों में ही कई उपलब्धियां हासिल की हैं. वह टीम की एकमात्र मिड फील्डर हैं जिसने रेगुलर टाइम में एकमात्र गोल किया. हर बार की तरह इस बार भी उसने मिड फील्ड में तेजी और स्ट्राइकिंग स्किल दिखाई. तो झारखंड के सिमडेगा जिले से टोक्यो और बर्मिंघम तक का उसका यात्रा कैसा रहा है? चुनौतियों का सामना कैसे किया? पढ़िए ये विशेष रिपोर्ट.

छोटी उम्र में ही सलीमा ने बड़े सपने देखे

सलीमा टेटे, उम्र 20 साल, 7 महीने. पहचान भारतीय स्त्री हॉकी टीम की स्टार प्लेयर. 10 वर्ष पहले की बात है जब झारखंड के सिमडेगा जिले के बड़की छापर गांव में बांस के स्टिक से एक लड़की हॉकी खेलती थी. पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि हॉकी स्टिक खरीद सकें. मिट्टी का बना घर ही आशियाना था. थोड़े बहुत खेत जिसकी पथरीली जमीन पर फसल उगाना कभी आसान नहीं रहा. खेतों के बीच बने चुओं (एक प्रकार के पानी का स्रोत) से जिनकी प्यास बुझती. वो घर में अकेली नहीं थी, चार बहनें और एक भाई भी थे. सभी को भरपेट खाना मिल जाए यही बहुत था. तंगहाली ऐसी कि बड़ी बहन को दिल्ली जाकर मजदूरी करनी पड़ी. तब भी सलीमा ने सपना देखा कि पैरों में जूते हों या न हों, हॉकी स्टिक नहीं तो भी कोई बात नहीं, जर्सी नहीं तो भी क्या…हॉकी तो खेलकर रहेंगे. छोटी सलीमा के इस बड़े सपने को पिता ने अपना सपना माना. इन्हें पूरा करने के लिए बेटी ने जोर लगाया और महज छह सालों में ही उसने टोक्यो ओलिंपिक से लेकर वर्ल्ड चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ तक का यात्रा पूरा कर लिया.जूनियर स्त्री हॉकी टीम ज्वाइन करने से पहले रांची से रवाना होती सलीमा टेटे. तस्वीर 2016 की है जिसे सिमडेगा हॉकी के प्रेसिडेंट मनोज कोनबेगी ने मौजूद कराई है.

बेटी को साइकिल पर बिठाकर ले जाते टूर्नामेंट खेलाने

सलीमा में छिपे टैलेंट को पहचानने वाले मनोज कुमार प्रसाद उर्फ मनोज कोनबेगी बताते हैं कि जब भी ग्रामीण स्तर पर प्रतियोगिता होती वो उसके पिता उसे साइकिल पर बिठाकर ले जाते. कभी 10 किमी तो कभी 25 किमी साइकिल चलाकर जाते. कई बार नाव से नदी पारकर बेटी को टूनार्मेंट खेलाने के लिए ले जाते. हर टूर्नामेंट में सलीमा के अच्छे खेल के लिए पुरस्कार के रूप में बकरी और मुर्गी मिलती थी.

पिता भी रहे हैं हॉकी प्लेयर

सलीमा के पिता सुलक्षण भी हॉकी के प्लेयर रहे हैं. मनोज कोनबेगी बताते हैं कि सुलक्षण भी अच्छे डिफेंडर रहे हैं. जिस टूर्नामेंट में उनकी बेटी खेली, उसी में पहले सुलक्षण खेलते थे. वह अपने गांव की टीम लेकर आते थे. पुरस्कार में मुर्गा या बकरा मिलता था. तब हॉकी खेलने का मतलब था पुरस्कार में खस्सी जीतना. टीम जब जीतकर लौटती तो गांव में उत्सव होता.तस्वीर में बायें से सुलक्षण टेटे, सुभानी टेटे, सलीमा टेटे और मनोज कोनबेगी.

बेटी को बांस के स्टीक से सिखाया हॉकी

सुलक्षण खेती करते हैं. उनके पास खेती से इतने पैसे नहीं आते थे जिससे कि वह बेटी को हॉकी स्टिक से प्रैक्टिस करा सकें. जब सलीमा 8-9 वर्ष की थी, तब उसे बंबू स्टिक से सिखाते थे. मूव कैसे करना है, कैसे हड़ताल करना है, डिफेंड करना है यह सब उन्होंने ही सिखाए.

9 वर्ष की उम्र में ही जबरदस्त स्ट्राइकर थी सलीमा

मनोज कोनबेगी बताते हैं कि 2010 में सलीमा टेटे नवयुवक संघ की ओर से आयोजित होने वाले हॉकी टूर्नामेंट में खेलने आई थी. उसके पिता सुलक्षण टेटे उसे लेकर आए थे. तब सलीमा की उम्र महज 9 साल थी. अगले वर्ष 2011 में भी वह पिता के साथ खेलने आई. तब मनोज ने सुलक्षण टेटे से बोला कि आपकी बेटी बेहतरीन हॉकी खेलती है. उसे किसी स्पोटर्स एकेडमी में डाल दीजिए. तब उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया. अगले वर्ष 2012 में भी वह टूर्नामेंट ​​​​​​​खेलने आई और बेस्ट प्लेयर का पुरस्कार जीता. मनोज ने पिछले वर्ष की बात दोहराई और बोला कि सलीमा की प्रतिभा को यूं बर्बाद नहीं होने दीजिए.सिमडेगा में ग्रामीण टूर्नामेंट में भाग लेती सलीमा टेटे. तस्वीर में दायें से दूसरे क्रम में.

ट्रायल के तीन वर्ष बाद बनी जूनियर स्त्री हॉकी टीम की कप्तान

2013 में सलीमा ने ट्रायल दिया और उसका चयन सिमडेगा स्थित स्पोटर्स एकेडमी में हो गया. ट्रायल के समय सलीमा की उम्र 12 साल के करीब थी. एकेडमी में आने के महज तीन वर्ष बाद ही उसका चयन भारतीय जूनियर टीम के लिए हो गया. वह खिलाड़ी जो सिमडेगा के गांवों में हॉकी खेलती थी, वह ऑस्ट्रेलिया टूर के लिए टीम में चुन ली गई. करिश्मा यह था कि 2017 में यूथ ओलिंपिक में वह जूनियर भारतीय स्त्री हॉकी की कप्तान बन गई. तब यूथ ओलिंपिक में सलीमा के नेतृत्व में हिंदुस्तान को सिल्वर मिला था. और फिर एक वर्ष बाद ही यानी 2018 में सलीमा भारतीय सीनियर स्त्री हॉकी टीम के लिए चुन ली गईं. उसके बाद टोक्यो ओलिंपिक में सलीमा के बेहतरीन खेल को सबने देखा.

मिड डे मील बनाती है मां

सलीमा की मां सुभानी टेटे एक सरकारी विद्यालय में रसोइया हैं. उन्हें महीने के एक हजार रुपए मिलते हैं. टोक्यो ओलिंपिक में बेटी के खेलने और आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद वो पहले की ही भांति बच्चों के लिए मिड डे मील तैयार करती हैं.

बड़ी बहन ने दिल्ली जाकर मजदूरी की

सलीमा की चार बहनें हैं और एक भाई है. जब घर की आर्थिक स्थिति खराब थी तब सुलक्षण के लिए परिवार चलाना कठिनाई था. विवशता में सलीमा की बड़ी बहन ने दिल्ली जाकर मजदूरी की. घरों में नौकरानी का काम किया.

छोटी बहन भी हॉकी में धमाल दिखाने को तैयार

सलीमा की छोटी बहन महिमा टेटे भी हॉकी प्लेयर है. वह जूनियर भारतीय स्त्री हॉकी टीम में है. अभी बेंगलुरु में नेशनल कैंप में है