रवि बिश्नोई मौजूदा अंडर19 वर्ल्ड कप में 11 विकेट लेकर टीम इंडिया के बने सबसे पास गेंदबाज

रवि बिश्नोई मौजूदा अंडर19 वर्ल्ड कप में 11 विकेट लेकर टीम इंडिया के बने सबसे पास गेंदबाज

 भारतीय अंडर 19 टीम (India U19 Team) साउथ अफ्रीका (South Africa) में हो रहे वर्ल्ड कप (U19 World Cup 2020) के फाइनल में पहुंच चुकी है। युवा जोश से भरी  इस टीम के खिलाड़ियों को देखकर उनके प्रयत्न का अंदाजा लगाना बहुत कठिन है।

कम आयु में जिम्मेदारियों के बोझ के साथ अपनी आंखों में क्रिकेट के सपने को जिस तरह इन खिलाड़ियों ने जिंदा रखा है वह हमें बहुत ज्यादा कुछ सीखाता है। क्रिकेट में हिंदुस्तान को जितना पसंद किया जाता है, इस खेल में नाम कमाना भी उतना ही कठिन है। हालांकि आज हम आपको जो कहानियां बताने जा रहे हैं उन सबने साबित किया कि उल्टा हालातों, कम आयु के बावजूद कड़ी मेहनत व दृढ़ निश्चय के साथ कैसे आंखों में बसे सपनों को जमीन पर उतारा जाता है।

रवि ने खुद बनवाई पिच
रवि जोधपुर के रहने वाले थे जहां कोई क्रिकेट पिच नहीं थी। बचपन से ही क्रिकेट को पसंद करने वाले रवि (Ravi Bishnoi) अपने बड़े भाई के साथ हर रोज क्रिकेट खेला करते थे।   रवि के पिता सरकारी स्कूल में हेडमास्टर थे व उन्हें उनका क्रिकेट खेलना पसंद नहीं आया। रवि (Ravi Bishnoi)  जैसे बच्चों के लिए जोधपुर में शाहरुख पठान व प्रद्योत सिंह नाम के दो दोस्तों ने एकेडमी खोलने का निर्णय किया।  अकेडमी खोलने के लिए पर्याप्त पैसा उनके पास नहीं था ऐसे में रवि जैसे बच्चों ने उनकी मदद की।


खर्च कम हो इसके लिए लोगों ने खुद ही मजदूरी का कार्य करना प्रारम्भ किया। रवि (Ravi Bishnoi) ने अकेडमी के कार्य के लिए मजदूरी की। वह सिमेंट का बैग लेकर एकेडमी पहुंचाते , पत्थर तोड़ते थे ताकी मजदूरी का खर्च बचाया जा सके। उनकी मजदूरी करने से जो पैसे बचे उससे एक्सपर्ट्स को बुलाकर अकेडमी की क्रिकेट पिच तैयार की गई थी। रवि (Ravi Bishnoi)  ने इसपीएन क्रिकइंफो को दिए साक्षात्कार में बोला था, 'वह छह महीने मेरे लिए बहुत ज्यादा कठिन थे, मैं बहुत ज्यादा मेहनत करता था बिना यह जाने कि इसका कोई लाभ भी होगा या नहीं। एकेडमी तैयार हुई व वहां से मेरा क्रिकेट का वास्तविक सफर प्रारम्भ हुआ। '


अंडर 16 टूर्नामेंट में उन्‍हें जब खेलने का मौका नहीं मिला तो उनके पिता ने उन्‍हें क्रिकेट छोड़ने को कह दिया था। उनके पिता का मानना था कि वह इस खेल के काबिल नहीं हैं। लेकिन रवि (Ravi Bishnoi)  के कोच प्रद्योत राठौड़ व शाहरुख खान ने उनके पिता को मनाया। दो वर्ष पहले उन्‍हें राजस्‍थान क्रिकेट एसोसिएशन में जूनियर सलेक्‍शन ट्रायल के दौरान चुना नहीं गया था। उन्‍हें पहले ही दिन बाहर कर दिया गया था। लेकिन जब उन्‍होंने दोबारा चयन किया तो उन्‍हें चुन लिया गया। इसके बाद उन्‍होंने घरेलू मैचों में 97 विकेट लिए थे। मां ने कंडक्टरी करके पूरा किया बेटे का सपना
भारतीय टीम के अर्थव अनकोलेकर (Atharv Ankolekar) अपने क्रिकेट की उपलब्धियों का सारा श्रेय अपनी मां को देते हैं। श्रीलंका में पिछले वर्ष एशिया कप फाइनल में बांग्लादेश के विरूद्ध पांच विकेट लेने वाले अथर्व (Atharv Ankolekar)  ने नौ साल की आयु में अपने पिता को खो दिया था। सास, ननद व दो बेटों की जिम्मेदारी उनकी मां वैदेही को उठानी पड़ी जो घर में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी। वैदेही ने अपने पति की स्थान वृहनमुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाय एंड ट्रांसपोर्ट (बेस्ट) की बसों में कंडक्टर की जॉब करके अथर्व (Atharv Ankolekar)  को क्रिकेटर बनाया। वैदेही ने एक इंटरव्यू  में बोला ,‘अथर्व के पापा का सपना था कि वह क्रिकेटर बने व उनके जाने के बाद मैने उसे पूरा किया। वह हमेशा नाइट शिफ्ट करते थे ताकि दिन में उसे प्रेक्टिस करा सके लेकिन उसकी कामयाबी देखने के लिये वह नहीं है। ’ अक्सर अथर्व के मैच के दिन वैदेही की ड्यूटी होती है लेकिन अब अंडर 19 दुनिया कप फाइनल रविवार को है तो वह पूरा मैच देखेंगी।


अपने प्रयत्न के दौर को याद करते हुए उन्होंने बताया ,‘वह बहुत ज्यादा मुश्किल दौर था। मैं उसे मैदान पर ले जाती लेकिन दूसरे बच्चे एक्सरसाइज के बाद जूस पीते या अच्छी चीजें खाते लेकिन मैं उसे कभी ये नहीं दे पाई। ’ उन्होंने बोला ,‘ लेकिन अथर्व के दोस्तों के माता पिता व उसके कोचों ने बहुत ज्यादा मदद की। ’ एशिया कप जीतने के बाद मां ने अपने बेटे को कोई तोहफा नहीं दिया लेकिन उसके लिये फोड़नीचा भात (बघारे चावल) व चनादाल का पोड़ा बनाया।   उन्होंने बोला ,‘अब हमारे दशा पहले से बेहतर है लेकिन अपने बुरे दौर को हममें से कोई नहीं भूला है। आज भी खुशी के मौके पर उसे छप्पन पकवान नहीं बल्कि वही खाना चाहिये जिसे खाकर वह बड़ा हुआ है। ’

यशस्वी के प्रयत्न ने दिलाई उन्हें सफलता
वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले भारतीय बल्लेबाज यशस्वी (Yashsvi Jayswal) की कहानी भी उतनी ही संघर्षों भरी है। यशस्वी यूपी के भदोही का रहने वाले हैं। उनके पिता भदोही में ही एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। यशस्वी (Yashsvi Jayswal)  को आरंभ से ही क्रिकेट खेलना पसंद था व अपना यह सपना पूरा करने के लिए वह कम आयु में ही मुंबई आ गए थे।


उनके पिता के लिए परिवार को पालना कठिन हो रहा था इसलिए उन्होंने एतराज़ भी नहीं किया। मुंबई में यशस्वी (Yashsvi Jayswal)  के चाचा का घर इतना बड़ा नहीं था कि वो उसे साथ रख सकें। इसलिए चाचा ने मुस्लिम यूनाइटेड क्लब से अनुरोध किया कि वो यशस्वी को टेंट में रहने की इजाज़त दें। अगले तीन वर्ष के लिए वो टेंट ही यशस्वी (Yashsvi Jayswal)  के लिए घर बन गया। वह खुद अपना खर्चा चलाने की प्रयास करते जिसके लिए उन्होंने कई कार्य भी किए। उनके पिता कई बार पैसे भेजते लेकिन वो कभी भी बहुत ज्यादा नहीं होते।


राम लीला के समय आज़ाद मैदान पर यशस्वी (Yashsvi Jayswal)  ने गोल-गप्पे भी बेचे। लेकिन इसके बावजूद कई रातों को उन्हें भूखा सोना पड़ता था। जल्द ही एक लोकल कोच ज्वाला सिंह यशस्वी से मिले व उन्हें कोचिंग देनी प्रारम्भ कर दी। यहां से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मुंबई के सेलेक्टर्स ने भी उनपर भरोसा दिखाया व उन्हें अंडर19 टीम में शामिल किया। यशस्वी ने यहां भी खुद को साबित किया व आखिरकार भारतीय अंडर 19 टीम में शामिल हो गए।

प्रियम को मिला पिता का साथ
भारतीय टीम के कैप्टन प्रियम गर्ग (Priyam Garg)  मेरठ के करीब किला परीक्षित गढ के रहने वाले हैं। बचपन में ही उन्होंने अपनी मां को खो दिया था।   तीन बहनों व दो भाइयों के परिवार को उनके पिता नरेश गर्ग (Naresh Garg) ने संभाला जिन्होंने दूध , अखबार बेचकर व बाद में स्कूल में वैन चलाकर उसके सपने को पूरा किया।


गर्ग के कोच संजय रस्तोगी ने  बोला ,‘ प्रियम ने अपने पापा का प्रयत्न देखा है जो इतनी दूर से उसे लेकर आते थे। यही वजह है कि वह शौकिया नहीं बल्कि पूरी ईमानदारी से कुछ बनने के लिये खेलता है। यह भविष्य में बड़ा खिलाड़ी बनेगा क्योंकि इसमें वह संजीदगी है। ’ नरेश ने दोस्तों से उधार लेकर प्रियम के लिये कभी क्रिकेट किट व कोचिंग का बंदोवस्त किया था व उनकी मेहनत रंग लाई जब वह 2018 में रणजी टीम में चुना गया। इसके बाद उन्हें अंडर19 टीम में शामिल किया गया। आज उनके घर वालों के लिए यह बेहद ही गर्व का पल है कि प्रियम (Priyam Garg) ना सिर्फ टीम का भाग हैं बल्कि बतौर कैप्टन हिंदुस्तान को फाइनल में पहुंचा चुके हैं।   अब उनके साथ-साथ पूरा हिंदुस्तान प्रियम को ट्रॉफी जीतते देखना चाहते हैं।