जब ट्रेनिंग में पहली बार मैंने विमान उड़ाया, तो लगा, जैसे मेरा सपना साकार हो गया...

जब ट्रेनिंग में पहली बार मैंने विमान उड़ाया, तो लगा, जैसे मेरा सपना साकार हो गया...

पायलट बनने का सपना मैंने बचपन से ही देखा था, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति देखते हुए हमेशा लगता था कि यह उड़ान इतनी सरल नहीं होगी. मेरा जन्म पंजाब के पठानकोट में हुआ. मेरे पिता सेना में सिपाही थे. जब मैं दस साल की थी, तब पापा की पोस्टिंग आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में हो गई. हम विजयवाड़ा आ गए. मेरी पढ़ाई-लिखाई विजयवाड़ा के केंद्रीय स्कूल से ही हुई. जहां अंग्रेजी व हिंदी, दोनों में पढ़ना-लिखना सिखाया जाता था.

हालांकि, वहां अंग्रेजी का प्रयोग कम ही किया जाता था. स्कूल के दिनों में जब मैं पायलट बनने की बात अपने दोस्तों के बीच करती थी, तो सब मेरा मजाक उड़ाते थे. नौवीं कक्षा के दौरान एक टीचर ने पूरी कक्षा को 10 वे चीजें लिखने के लिए कही, जिनको पाने के लिए हमें लक्ष्य बनाकर तैयारी करनी थी.



इस असाइनमेंट ने मुझे प्रभावित किया. मेरी पहली पसंद पायलट बनना थी. खैर, 12वीं पास करने के बाद जहां मेरे सभी दोस्तों ने मेडिकल, इंजीनियरिंग की कोचिंग प्रारम्भ की, वहीं मैंने यूपी के फ्लाइंग स्कूल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी में प्रवेश पाने के लिए मेहनत प्रारम्भ कर दी. हालांकि यह बेहद परेशानी भरा सफर रहा.

अकादमी की फीस तब करीब पंद्रह लाख रुपये थी, जिसे दे पाना मेरे पिता के लिए नामुमकिन था. लेकिन उन्होंने मेरे सपने के बीच इस समस्या को नहीं आने दिया. लिहाजा उन्होंने कुछ पैसे अपने दोस्तों से उधार लिए व बाकी फीस एजुकेशन ऋण के माध्यम से अदा करने का निर्णय किया. हालांकि बाद में मुझे स्कॉलरशिप भी मिली, जिसने राह सरल बना दी.

मैंने अकादमी में प्रवेश ले लिया, पर समस्याओं ने यहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा. मैं स्कूल के दिनों से ही अंग्रेजी पढ़-लिख लेती थी. मगर अंग्रेजी में बोल पाना किसी चुनौती से कम न था.मुझे अंग्रेजी में बोलने व उस माहौल में खुद को ढालने में वक्त लगा.

मेरी बेकार अंग्रेजी का लोग मजाक उड़ाया करते थे व यह बात मुझे बहुत परेशान करती थी. कई बार तो ऐसा हुआ कि मैंने अकादमी छोड़ने व घर जाने का मन बना लिया, लेकिन पिता के भरोसे व पायलट बनने के सपने ने ऐसा करने न दिया. पहले सभी लोग मुझ पर हंसते थे, मेरा मजाक बनाते थे. लेकिन कुछ समय बाद वही लोग मेरी गलतियों को भी सुधारने लगे.

मात्र 19 वर्ष की आयु में मैंने अपनी ट्रेनिंग पूरी की. जब ट्रेनिंग में पहली बार मैंने विमान उड़ाया, तो लगा, जैसे मेरा सपना साकार हो गया. ट्रेनिंग समाप्त होने के तुरंत बाद ही मुझे एयर इंडिया में जॉब मिल गई. जॉब के दौरान ही मैं पहली बार विदेश गई, जहां से ट्रेनिंग के लिए मुझे स्पेन भी भेजा गया. जब मैं 21 वर्ष की थी, तभी ट्रेनिंग के लिए मुझे लंदन भेजा गया. यही वह समय था, जब मैंने पहली बार बोइंग 777 उड़ाया था. मुझे पता नहीं था, पर बाद में किसी ने बताया कि मैं बोइंग 777 उड़ाने वाली संसार की सबसे युवा महिला कमांडर बन चुकी हूं.

आज भी विजयवाड़ा के कई कॉलेजों में लड़कियों को पैंट-शर्ट पहने की अनुमति नहीं है. लेकिन संसार घूमने के बाद मेरी लाइफस्टाइल बदली है व मेरी समझ बढ़ी है. मैं ऐसे होनहारों को गाइड करने के साथ पायलट बनने की ट्रेनिंग देना चाहती हूं, जो जानकारी के अभाव और दूसरी चुनौतियों के चलते अपने सपने सारे नहीं कर पाते. मुझे पता है कि चुनौतियां हर कार्य में होती हैं, लेकिन मेरा अनुभव है कि खुद को लक्ष्य पर केंद्रित कर सफलता प्राप्त की जा सकती है.