हिंदुस्तान में 62.5 प्रतिशत बच्चे करते है मजदूरी : रिपोर्ट

हिंदुस्तान में 62.5 प्रतिशत बच्चे करते है मजदूरी : रिपोर्ट

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हिंदुस्तान में बाल मजदूरी करने वाले ज़्यादातर बच्चे किसी फैक्टरी या वर्कशॉप में कार्य नहीं करते. न ही वे शहरी क्षेत्रों में घरेलू नौकर या गलियों में सामान बेचने का कार्य करते हैं. ऐसे ज़्यादातर बच्चे खेतों में कार्य करते हैं. ये बच्चे फसलों की बुवाई, कटाई, फसलों पर कीटनाशक छिड़कना, खाद डालना, पशुओं व पौधों की देखभल करना, जैसे कार्य करते हैं. बाल मजदूरी निषेध दिवस (12 जून) पर 'क्राई-चाइल्ड राईट्स एंड यू' द्वारा जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है. वर्ष 2016 में जारी 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 18 साल से कम आयु के 62.5 प्रतिशत बच्चे खेती या इससे जुड़े अन्य व्यवसायों में कार्य करते हैं. आंकड़ों की बात करें तो कार्य करने वाले चार करोड़ तीन लाख 40 हजार बच्चों व किशोरों में से दो करोड़ 52 लाख 30 हजार बच्चे कृषि क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं.

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, हिंदुस्तान में लगभग 15 करोड़ 20 लाख बच्चे बाल मजदूरी करते हैं. मजदूरी करने वाले इन 10 बच्चों में से 7 बच्चे खेती का कार्य करते हैं. हिंदुस्तान के मौजूदा रूझानों से भी कुछ ऐसी ही तस्वीर सामने आई है कि यहां 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे खेती या इससे संबंधित अन्य गतिविधियों में कार्यकर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का बोलना है कि खेती संसार भर में दूसरा सबसे खतरनाक व्यवसाय है.

हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक बच्चे खेती कार्यों में लगे

कुछ राज्यों में बच्चों के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे भारतीय औसत की तुलना में अधिक हैं. हिमाचल प्रदेश में खेती करने वाले बच्चों की संख्या बहुत अधिक यानी 86.33 प्रतिशतबताई गई है. छत्तीसगढ़ व नागालैंड में यह फीसदी क्रमशः 85.09 एवं 80.14 है. बड़े राज्यों की बात करें तो मध्यप्रदेश में यह संख्या 78.36 फीसदी, राजस्थान में 74.69 फीसदी, बिहार में 72.35 फीसदी, उड़ीसा में 69 प्रतिशत व असम में 62.42 प्रतिशत है. कुल मिलाकर हिंदुस्तान में 5-19 साल के चार करोड़ तीन लाख 40 हजार बच्चे व किशोर कार्य करते हैं.इनमें से 62 प्रतिशत लड़के व 38 प्रतिशत लड़कियां शामिल हैं.

खेतों में मजदूरी करने वाले ज़्यादातर बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते

क्राई-चाइल्ड राईट्स एंड यू द्वारा 2011 की जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि खेतों में मजदूरी करने वाले ज़्यादातर बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते. 5-19 साल के चार करोड़ तीन लाख 40 हजार कार्य करने वाले बच्चों व किशोरों में से मात्र 99 लाख बच्चे ही स्कूल जा पाते हैं, यानि कार्य करने वाले 24.5 प्रतिशत बच्चे ही स्कूल जाते हैं. सरल शब्दों में कहें तो कार्य करने वाले हर चार में तीन बच्चों से उनकी एजुकेशन का अधिकार छीन लिया जाता है.

बच्चों के कार्य व एजुकेशन के बीच संतुलन बनाने में कई बड़ी चुनौतियां हैं. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार एजुकेशन के अधिकार के प्रावधान के बावजूद खेतों में मजदूरी करने वाले बहुत कम बच्चे ही अपनी पढ़ाई जारी रख पाते हैं.

खेतों में मजदूरी करना बच्चों के लिए खतरनाक

पॉलिसी एडवोकेसी एंड रिसर्च की निदेशक प्रीति महारा के मुताबिक, बाल मजदूरी के कानूनों के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे स्कूल के बाद ही अपने परिवार के कारोबार में मदद कर सकते हैं. बच्चों के इस परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो खेतों में मजदूरी करना बच्चों के लिए खतरनाक है. वजह, इस क्षेत्र की अपनी कई चुनौतियां हैं, जैसे कीटनाशकों का स्प्रे वखेती कार्यों में उपकरणों का इस्तेमाल, आदि से बच्चों के विकास में बाधा आ सकती है. उनके शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है.

पिछले चार दशकों के अनुभव बताते हैं कि हमारे देश में खेती का ज़्यादातर कार्य ऐसी परिस्थितियों में किया जाता है, जब कार्य व ज़िंदगी के बीच विशेष सीमा नहीं होती. खेतों में कार्यकरने वाले बच्चे खतरनाक कीटनाशकों तथा इनकी वजह से प्रदूषित हुए पानी एवं भोजन के सम्पर्क में रहते हैं. खेतों में लंबे समय तक कार्य करने के दौरान बच्चों को कम आयु में बहुत ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जैसे लंबे समय तक खड़े रहना, झुकना व भारी बोझ उठाना.

इस समस्या के निवारण के लिए सबसे पहले उस कारण पर ध्यान देना होगा जिसकी वजह से बच्चों को कार्य के लिए विवश किया जाता है. प्रीति महारा ने कहा, बच्चे अक्सर अपने माता-पिता की मदद के लिए कार्य करते हैं, क्योंकि उनके परिवार की आय पर्याप्त नहीं होती. मार्केट में सस्ते श्रम की मांग के चलते भी बच्चों को कार्य के लिए विवश किया जाता है.लंबे समय तक कार्य करने के कारण वे स्कूल नहीं जा पाते. इस तरह वे एजुकेशन के अधिकार से वंचित रह जाते हैं. कहीं न कहीं उन्हें खेल व मनोरंजक गतिविधियों से भी समझौता करना पड़ता है.

इस समस्या का निवारण तभी किया जा सकता है जब बच्चों को स्कूल भेजा जाए, न कि खेतों में. वंचित समुदाय के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण स्कूली एजुकेशन देना ज़रूरी है, इसके लिए अध्यापकों, अभिभावकों, सामुदायिक नेताओं को भी बाल एजुकेशन के फायदों एवं बाल मजदूरी के निगेटिव प्रभावों के बारे में जागरुक बनना चाहिए. साथ ही परिवारजनों को आजीविका, भोजन सुरक्षा एवं अन्य सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए. मजदूरी के कार्यों में लगे बच्चों को तुरंत स्कूल भेजा जाना चाहिए.