न्याय व्यवस्था में कैसे आया क्यूरेटिव पिटीशन, आइए जानिए

न्याय व्यवस्था में कैसे आया क्यूरेटिव पिटीशन, आइए जानिए

निर्भया गैंगरेप हत्या केस (Nirbhaya Gangrape Case) में आज उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में इसके दो दोषियों विनय व मुकेश कुमार की क्यूरेटिव पिटीशन (Curative Petition) पर सुनवाई होगी।

निर्भया केस में चारों दोषियों का डेथ वॉरन्ट जारी हो चुका है। इसके बाद दो दोषियों विनय व मुकेश ने उच्चतम न्यायालय में क्यूरेटिव पिटीशन डाली है। इनके पिटीशन पर उच्चतम न्यायालय के जज एनवी रमना, अरुण मिश्रा, आरएफ नरीमन, आर भानुमति व अशोक भूषण की बेंच सुनवाई करेगी।

क्या होता है क्यूरेटिव पिटीशन
क्यूरेटिव पिटीशन को न्यायिक व्यवस्था में न्याय पाने के आखिरी तरीका के तौर पर जाना जाता है। ये आखिरी तरीका है, जिसके जरिए कोई अनसुनी रह गई बात या तथ्य को न्यायालय सुनती है। ये उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई व्यवस्था है, जो उसकी ही शक्तियों के विरूद्ध कार्य करती है।

क्यूरेटिव पिटीशन में सारे निर्णय पर चर्चा नहीं होती है। इसमें सिर्फ कुछ बिन्दुओं पर दोबारा से विचार किया जाता है। न्यायालय में आखिरी ऑप्शन के तौर पर इसका प्रयोग किया जाता है। निर्भया केस के आरोपी अपने फांसी की सजा टालने के आखिरी तरीका के तौर पर इसे अपना रहे हैं। वो चाहते हैं कि किसी भी तरह से उनकी फांसी की सजा उम्रकैद में बदल जाए।

क्यूरेटिव पिटीशन डालने वाले एक दोषी विनय शर्मा की तरफ से बोला गया है कि न्यायालय को विचार करना चाहिए कि घटना के वक्त उसकी आयु सिर्फ 19 वर्ष की थी। उस अवस्था में उसके सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि पर विचार करके न्यायालय को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय में निर्भया केस के दोषियों की क्यूरेटिव पिटीशन पर सुनवाई होगी



विनय शर्मा की तरफ से बोला गया है कि न्यायालय ने बलात्कार व हत्या से जुड़े 17 दूसरे मामलों में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला है। इसी तरह से विनय को भी राहत दी जानी चाहिए। क्यूरेटिव पिटीशन व रिव्यू पिटीशन में अंतर
क्यूरेटिव पिटीशन व रिव्यू पिटीशन में अंतर होता है। रिव्यू पिटीशन में न्यायालय अपने सारे निर्णय पर पुनर्विचार करती है, जबकि क्यूरेटिव पिटीशन में निर्णय के कुछ बिंदुओं पर विचार किया जाता है। न्यायालय को अगर लगता है कि किसी मामले या किसी बिंदु पर दोबारा से विचार करने की आवश्यकता है तो क्यूरेटिव पिटीशन के दौरान उस पर विचार होता है। उच्चतम न्यायालय में क्यूरेटिव पिटीशन के दौरान अगर सुनवाई होती है व फांसी के दिन तक इस पर निर्णय नहीं आता है तो फांसी की तारीख टल सकती है।

न्याय व्यवस्था में कैसे आया क्यूरेटिव पिटीशन
क्यूरेटिव पिटीशन को न्याय पाने के आखिरी तरीका के तौर पर देखा जाता है, जो देश के हर नागरिक को संविधान के जरिए मिलती है। क्यूरेटिव पिटीशन रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा के एक मुद्दे से सामने आया। इस मुद्दे में न्यायालय के सामने ये सवाल उठा कि क्या उच्चतम न्यायालय में रिव्यू पिटीशन खारिज हो जाने के बाद भी कोई तरीका है, जिसके जरिये आरोपी या दोषी आदमी न्यायालय के सामने मुद्दे पर एक बार व विचार करने का आग्रह कर सके।

निर्भया गैंगरेप-मर्डर मुद्दे के चारों दोषी।



इस पर न्यायालय का बोलना था कि न्यायिक व्यवस्था में किसी के साथ पक्षपात नहीं होना चाहिए। न्यायालय को अगर लगता है कि उसके ही निर्णय की वजह से किसी भी तरह का पक्षपात हो रहा है तो वो इसके कुछ बिंदुओं पर दोबारा से विचार कर सकती है। इस तरह से क्यूरेटिव पिटीशन की व्यवस्था सामने आई।

क्यूरेटिव पिटीशन रिव्यू पिटीशन के खारिज होने के बाद का आखिरी तरीका है। न्यायालय में आमतौर पर क्यूरेटिव पिटीशन हर मुद्दे में नहीं डाला जाता है। रेयर मामलों में ही न्यायालय क्यूरेटिव पिटीशन को सुनने को राजी होती है। अगर न्यायालय को लगता है कि प्राकृतिक न्याय में किसी भी तरह की अनदेखी हुई है तभी न्यायालय क्यूरेटिव पिटीशन सुनने पर राजी होती है।