आज पढ़े, 'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं 'शहरयार' का मुहब्‍बत भरा कलाम

आज पढ़े, 'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं 'शहरयार' का मुहब्‍बत भरा कलाम

उर्दू के प्रसिद्ध शायर (Shayar) 'शहरयार' किसी तार्रुफ़ के मोहताज नहीं है। उनका असल नाम कुंवर अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान (Akhlaq Mohammed Khan) था, मगर शेरो-सुख़न की संसार में 'शहरयार' (Shahryar) के नाम से जाने जाते हैं। उनका जन्‍म 16 जून, 1936 को उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh) के जिला बरेली (Bareilly) में हुआ था। 

उन्‍होंने फिल्‍मों के लिए भी गीत लिखे। 'उमराव जान' की प्रसिद्ध ग़ज़ल (Ghazal) आज भी लोगों की ज़बान पर हैं। उन्‍हें ज्ञान पीठ व साहित्य अकादमी सहित कई अहम सम्मानों से नवाज़ा गया। उनकी अहम किताबों में ख़्वाब का दर बंद है, शाम होने वाली है, मिलता रहूंगा ख़्वाब में आदि शामिल हैं। आज हम 'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं 'शहरयार' का मुहब्‍बत भरा कलाम लेकर, तो पढ़िए व लुत्‍फ़ उठाइए



परेशान सा क्यों है
सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यों है



इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंढ़े

पत्थर की तरह बे-हिस ओ बे-जान सा क्यों है

तन्हाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ो

ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यों है

हम ने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की

वो ज़ूद-पशेमान पशेमान सा क्यों है

क्या कोई नयी बात नज़र आती है हम में

आईना हमें देख के दंग सा क्यों है



देख ली संसार हमने
जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने

इस बहाने से मगर देख ली संसार हम ने

सब का अहवाल वही है जो हमारा है आज

ये अलग बात कि शिकवा किया तन्हा हम ने

ख़ुद पशेमान हुए ने उसे शर्मिंदा किया

इश्क़ की वज़्अ को क्या ख़ूब निभाया हम ने

कौन सा क़हर ये आंखों पे हुआ है नाज़िल

एक मुद्दत से कोई ख़्वाब न देखा हम ने

आयु भर हकीकत ही बोला हकीकत के सिवा कुछ न कहा

अज्र क्या इस का मिलेगा ये न सोचा हम ने



कहा मान लीजिए
दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए

बस एक बार मेरा बोला मान लीजिए

इस अंजुमन में आप को आना है बार बार

दीवार-ओ-दर को ग़ौर से पहचान लीजिए

माना कि दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास

लेकिन ये क्या कि ग़ैर का एहसान लीजिए

कहिए तो आसमां को ज़मीं पर उतार लाएं

कठिन नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए



लहू से लिखा गया
किस किस तरह से मुझ को न रुस्वा किया गया

ग़ैरों का नाम मेरे लहू से लिखा गया

निकला था मैं सदा-ए-जरस की तलाश में

धोके से इस सुकूत के सहरा में आ गया

क्यों आज उस का ज़िक्र मुझे ख़ुश न कर सका

क्यों आज उस का नाम मेरा दिल दुखा गया

मैं जिस्म के हिसार में महसूर हूं अभी

वो रूह की हदों से भी आगे चला गया

इस हादसे को सुन के करेगा यक़ीं कोई

सूरज को एक झोंका हवा का बुझा गया



नज़र आता है मुझे

दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे

फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे

रात का वक़्त है सूरज है मेरा राह-नुमा

देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे

मेरी इन आंखों को ख़्वाबों से पशेमानी है

नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे

तेरा मुंकिर नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है

बिछड़े लोगों से कहां कैसे मिलाता है मुझे

क़िस्सा-ए-दर्द में ये बात कहां से आई

मैं बहुत हंसता हूं जब कोई सुनाता है मुझे