मन का मीत: प्रेम हमें जीवन के किसी भी पड़ाव पर मिल सकता है. आवश्यकता है तो केवल उसे पहचानने की...

मन का मीत: प्रेम हमें जीवन के किसी भी पड़ाव पर मिल सकता है. आवश्यकता है तो केवल उसे पहचानने की...

ये कहानी गोवा स्थित एक छोटे से गांव अलोर्ना की है. इस गांव में गायत्री नाम की एक विधवा लड़की कई वर्षों से एक बड़े से घर में रहती थी. लोग कहते थे कि अपने पति को उसने ही मारा है. इतना ही नहीं, उसे बदजात और कुलक्षणी जैसे कटु शब्दों से बुलाया जाता था.

वह छोटी सी उम्र में विधवा हो गयी थी. अभी करीब 30 वर्ष की थी. उसके आगे पूरी जीवन पड़ी थी. अपना गुजारा करने के लिए वह घर के कुछ कमरे किराये पर दे दिया करती थी. पर गांव वालों की बातों में आ कर किरायेदार अक्सर कमरा खाली कर देते थे.

एक तो अपने हालात से परेशान ऊपर से भूख से रोज तड़पती क्या न करती. गायत्री ने नौकरानी बन घरों में काम करना प्रारम्भ कर दिया. यही कोई चार से पांच घरों में गायत्री दिन भर जा कर काम कर जैसे तैसे अपना गुजारा कर रही थी. मगर गांव वालों ने उसके बारे में बुरी बातें इस हद तक फैला दी थी कि अब कोई उसे काम पर भी नहीं रखना चाहता था.

एक दिन गायत्री हाईवे की तरफ से होते हुए दोपहर में थकी हुई अपने घर जा रही थी. आज उसे अंतिम घर ने भी काम से निकाल दिया था. वह अपने बचे खुचे रुपए गिनती हुई घर की तरफ बढ़ रही थी. इन हालात में वह कैसे अपना पेट पालेगी इसी सोच में चलते चलते न जाने कब वह एक गाड़ी से टकरा गई और जमीन पर गिर पड़ी.

कुछ दूर जाकर गाड़ी रुकी. उसमें से सूट-बूट में एक अफसर उतरा. साथ में एक बंदूक धारी हवलदार भी था. उस अफसर ने तुरंत गायत्री को उठाया और हवलदार ने उसके रुपए उठा लिए. वे गायत्री को गाड़ी में बिठा कर नजदीकी हॉस्पिटल की तरफ चल पड़े.

रास्ते में गायत्री बोली, “अरे साहब, जरा सी चोट थी, क्या आवश्यकता थी मुझे गाड़ी में बैठाने की, आपकी सीट खून से खराब हो गई.

सामने से कोई उत्तर न आया. कुछ देर में हॉस्पिटल पहुंच गए और गायत्री को एडमिट करा दिया गया.

हवलदार ने हॉस्पिटल के रिसेप्शन पर कहा, “ये हमारे जिले के नए डीएम संजीव केसरी जी हैं.

बस फिर क्या था, एक तरफ गायत्री का उपचार चल रहा था और दूसरी तरफ संजीव की खातिरदारी. उन्हें वहीं बैठे हुए गायत्री के बारे में सारी कहानियां सुनने को मिल गईं. ये सब जान कर संजीव हैरत में था कि आज के जमाने में भी गांव-देहात में इस तरह की प्रताड़ना दी जा रही है.

संजीव के दिल में गायत्री के लिए हमदर्दी थी. उसने अगले ही पल निर्णय ले लिया कि वो सरकारी घर की स्थान गायत्री के घर में कमरा किराये पर ले कर रहेगा.

गायत्री पट्टी करवा कर बाहर आयी तो संजीव ने हवलदार को बोल कर उसे सूचित करवा दिया कि तेरे घर में एक फ्लोर खाली कर देना, साहब वहां किराये पर रहेंगे.

गायत्री ये सुन कर खुश हो गयी. घर जा कर वह साफ-सफाई में लग गयी.

फिर वह दिन आ गया जब संजीव को शिफ्ट होना था. आज गायत्री के घर के बाहर काफी चहल पहल थी. जहां एक तरफ गांव वाले रज रज के बातें बना रहे थे, दूसरी तरफ गायत्री के घर के बाहर कई सरकारी हवलदार सामान अंदर रख रहे थे. साथ ही गायत्री भी काम में लगी हुई थी. इतने नेकदिल अफसर को किसी तरह कि तकलीफ हो ये गायत्री एकदम भी बर्दाश्त नहीं कर सकती थी.

कुछ ही दिनों में गायत्री उनसे ऐसे घुल मिल गई जैसे परिवार ही हों. वो अक्सर संजीव के लिए टेस्टी खाना बना कर ले जाती और वो भी खुशी खुशी स्वीकार कर लेते. कहीं बाहर जाना हो तो गायत्री को बता कर जाया करते. कहीं न कहीं दोनों एक दूसरे पर निर्भर रहने लगे थे.

एक दिन संजीव घर आया तो गायत्री ने मुस्कुरा कर कहा, “साहब, आज बड़ी देर कर दी, ऑफिस में काम अधिक होगा शायद.

फिर कुछ सोचकर बोली, “अरे हां! आज आपके लिए एक चिट्ठी आयी थी… ये रही… आप पढ़िए, मैं खाना लगाती हूं.

चिट्ठी में लिखा था, संजीव के माता-पिता वहां दो दिन में आने वाले हैं. उस रात संजीव थोड़ा सोच में पड़ गए कि माता-पिता कहीं गांव वालों की बातों में आ कर कुछ गलत न समझ लें.

कुछ सोच कर संजीव ने उस रात गायत्री से कहा, “आज साथ बैठ कर खाना खा लेते हैं.

गायत्री ने पहले तो संकोच किया, पर फिर मान गई.

दोनों ने साथ खाना खाया. खाते समय बातों बातों में संजीव ने बता दिया कि उसके पेरेंट्स आने वाले हैं.

गायत्री ने तुरंत उत्तर दिया, “साहब, आपको कोई तकलीफ नहीं होने दूंगी, उनका स्वागत है.

गायत्री पूरी लगन से संजीव के कमरे की साफ-सफाई करने लगी.

दो दिन बाद संजीव के माता-पिता आ गये. संजीव को सरकारी क्वार्टर छोड़ गायत्री के घर में रहता देख बहुत गुस्सा हुए. संजीव ने समझाने की प्रयास की, पर वे एक पल भी उस घर में नहीं रहना चाहते थे इसलिए वे चले गए.

गायत्री बाहर खड़ी सब सुन रही थी. जब सब शांत हो गए तो अंदर गई और हाथ जोड़ कर बोली, “मुझ बेचारी पर और कितने उपकार करेंगे साहब! मैंने सुना है सरकारी क्वार्टर बड़ा होता है, वहीं रह लीजिए.

“क्यों, अब खाना बना कर नहीं खिलाओगी तुम? बस चार दिन की ही अतिथि नवाजी थी?” ये कह कर संजीव मुस्कुरा दिए.

“नहीं, आप समझ नहीं रहे, गांव वाले आपके बारे में भी बातें बनाएंगे और मुझ से सुना नहीं जाएगा. और आपके मां-बाबा…” ये कह कर वह रुक गई.

संजीव ने चेहरे पर गंभीर रेट लाते हुए कहा, “मुझ से भी नहीं देखा जाता गायत्री, लोगों का तुम्हें कुछ भी कहना. क्यों न हम शादी…”

गायत्री ने संजीव को बीच में ही टोक दिया. चौंकते हुए बोली, “हे राम! नहीं साहब… कहां आप और कहां मैं. मेरे लिए आप पहले ही बहुत कुछ कर चुके हैं. नहीं, मुझ अभागन के लिए आप अपना जीवन व्यर्थ न करें.

संजीव ने गायत्री को बैठने को बोला और उसका हाथ अपने हाथ में ले कर बोले, “अभागन तुम नहीं हो गायत्री, बल्कि वो लोग अभागे हैं जो तुम्हें समझ नहीं पाए. और ये कोई उपकार नहीं है, मुझे प्रेम हो गया है तुम से. मेरी जीवन पर लोगों से अधिक मेरा अधिकार है. क्या तुम्हारे मन में मेरे लिए कुछ भी नहीं?”

गायत्री की आंखें नम हो गईं, गला रुंध गया. इससे पहले कि वह कुछ कहती संजीव ने उसे कस के गले लगा लिया.

प्रेम हमें जीवन के किसी भी पड़ाव पर मिल सकता है. आवश्यकता है तो केवल उसे पहचानने की, उसे दिल से अपनाने की.

– हेमा काण्डपाल

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