अब दिल की धड़कन से खुलेगी डिप्रेशन की पोल

अब दिल की धड़कन से खुलेगी डिप्रेशन की पोल

डिप्रेशन 21वीं सदी की भागमभाग भरी जिंदगी की सबसे आम रोंगों में से एक है. कोई आदमी डिप्रेशन से तो नहीं जूझ रहा, इसका अंदाजा महज उसकी दिल की धड़कन नापकर लगाया जा सकता है. जर्मनी स्थित गॉएथे यूनिवर्सिटी का हालिया अध्ययन तो कुछ यही दावा करता है. 

शोधकर्ताओं के मुताबिक डिप्रेशन रोगियों का दिल दिन में हर मिनट सामान्य से 10 से 15 बार अलावा धड़कता है. वहीं, रात में हृदयगति में थोड़ी कमी जरूर आती है, लेकिन यह स्वास्थ्य वर्धक लोगों से फिर भी अधिक होती है. दिनभर के तनाव व कार्य के दबाव से तन-मन को थोड़ी राहत मिलना इसकी मुख्य वजह है.

डाक्टर कार्मेन शिवेक के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ‘ईकोकार्डियोग्राम पट्टी’ की सहायता से लगातार एक सप्ताह तक 32 लोगों की हृदयगति पर पल-पल नजर रखी. इनमें से आधे डिप्रेशन से जूझ रहे थे, जबकि बाकी मानसिक रूप से पूरी तरह से स्वस्थ थे. 90 प्रतिशत मामलों में शोधकर्ता प्रतिभागियों के दिल की धड़कन का विश्लेषण मात्र करके यह पता लगाने में सफल रहे कि उन्हें डिप्रेशन की शिकायत है या नहीं.

शिवेक ने बताया कि डिप्रेशन बीमार हमेशा इस उलझन में रहते हैं कि उन्हें किसी हालात का डटकर सामना करना चाहिए या फिर उससे पीछे हट जाने में ही भलाई है. इस कारण उनमें स्ट्रेस हार्मोन ‘कॉर्टिसोल’ का उत्पादन तो बढ़ ही जाता है, साथ ही दिल को भी खून पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि डिप्रेशन रोगियों में बेचैनी की शिकायत के चलते ‘वेगस’ नस की सक्रियता में कमी आती है. यह नस हृदयगति को नियंत्रित रखने में अहम किरदार निभाती है. इसकी सक्रियता घटने से दिल की धड़कन में उतार-चढ़ाव की शिकायत सता सकती है. 

शोधकर्ताओं ने दावा कि शरीर के तापमान, हृदयगति व शारीरिक सक्रियता पर नजर रखने वाले फिटनेस ट्रैकर भी डिप्रेशन की पोल खोलने में सहायता गार साबित हो सकते हैं. आदमी इसकी सहायता से समय रहते खुद के अवसादग्रस्त होने का पता लगा सकता है. इससे योग-अध्यात्म अपनाने, प्रकृति के साथ समय गुजारने, खानपान में परिवर्तन लाने व अपनों से सम्पर्क बढ़ाने जैसे तरीकों के जरिये डिप्रेशन के लक्षणों से जल्द राहत पाई जा सकती है. अध्ययन के नतीजे ‘यूरोपियन कॉलेज ऑफ न्यूरोसाइकोफार्माकोलॉजी’ के हालिया अंक में प्रकाशित किए गए हैं.